अमर ग्रंथालय मैं आपका स्वागत हैं

विक्रम संवत १९८७ वीर निर्वाण संवत १९५७ दिन बुधवार पौष - कृष्णा पंचमी में अमर ग्रंथालय की स्थापना की गई | इस ग्रंथालय में हस्तलिखित व् मुद्रित शास्त्रों की एक - एक , दो - दो प्रतियों का स्थाई संरक्षण किया जाता था हस्तलिखित व् मुद्रित अतिरिक्त प्रतियाँ धर्म प्राचारार्थ लागत मूल्य पर विक्रय हेतु उपलब्ध कराई जाती थी | उस परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए वर्तमान में अमर ग्रंथालय में अच्छी मात्रा में सत्साहित्य विक्रय हेतु उपलब्ध है जो की ज्ञान प्रचार का श्रेष्ठ साधन है |

जिनवाणी भी मोक्ष मार्ग का एक नक्शा हैं l कहाँ किस स्थान किस वस्तु का अस्तित्व हैं ? इस बात को बताने के जिनवाणी परम साक्षय हैं l


वैज्ञानिक- मनोवैज्ञानिक, सामाजिक- धार्मिक- आगमिक तौर-तरीकों से संस्कारो को सुरक्षित रखने की पद्धति संस्कृति कहलाती है| संस्कृति वाही जीवन्त है जिसके संस्कार सुरक्षित आचरित है| हमारे जीवन के संस्कारो का प्रथम- आदि मंगलाचरण मंदिर है|

प्रतिमा की छाती (वक्ष) पर चार पंखुड़ी का एक फूल-सा बना होता हैं | यह चिन्ह तीर्थंकरो के एक हजार आठ शुभ चिन्हों में से श्रीवत्स नाम का चिन्ह हैं | श्री का अर्थ हैं लक्ष्मी एवं वत्स का अर्थ हैं पुत्र अर्थात जिनको अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख एवं अनन्तवीर्य रूप अंतरंग अनंत चतुष्टय लक्ष्मी प्राप्ती हुई है एवं बहिरंग में भी समवशरण आदि लक्ष्मी से शोभायमान है, 'श्रीवत्स' चिन्ह यानि लक्ष्मीपुत्र, नियम से तीर्थकरों के होता है | अरिहंतों के होने का नियम नहीं हैं |

नासाग्र दृष्टि होने का अर्थ


नासाग्र दृष्टि होने का अर्थ हैं जिन्होंने अंतरात्मा का दर्शन कर स्वरूप में लीन हो, "परमात्मा" का पावन पद प्राप्त कर लिया हैं | क्योंकी बहिरात्मा जीव के काम- क्रोध- मद- लोभ की जागृति होने पर उसकी आँखों- पलकों-भौहों में विकार अवश्य आता हैं |

आप मंदिर जी के दर्शन करने आये हैं, देखने आये हैं , आँखे बंद करने नहीं आये हैं | हाँ ! प्रारम्भ में मंदिर जी में वेदियों की प्रत्येक मूर्ति के स्वरूप को ग़ौर से देखो, न जाने किस मूर्ति का सूर्यमंत्र आपकी चेतना को छू जाये और आपके अंदर सम्यक्त्व का कमल खिल जाये |

मुख शुद्धि से हमारे पाठ या मंत्रोच्चारण एवं शरीर शुद्धि बानी रहती हैं एवं हमारे अंदर पूज्यो का बहुमान एवं विनम्र गन प्रगट होते हैं |

भगवान के सामने भोगों के भिखारी बनकर मत आइये | बल्कि भोगों के त्यागी बनकर उच्चकोटि के दाता बनकर जाइये, तभी देव- दर्शन का सही लाभ हो सकता हैं |

द्रव्य चढ़ाना हमारे परिणामो को विशुद्ध बनाने में निमित्त हैं तथा जितने द्रव्य को हम प्रभो चरणो में अर्पण करते हैं, उतना हमारा 'लोभ' का त्याग होता हैं |

जब मंदिर जी का निर्माल्य द्रव्य खाने से दरिद्रता मिल सकती हैं, तब मंदिर जी में द्रव्य चढ़ाने से धन वैभव मिल जाये तो क्या आश्चर्य हैं?

" जो पिच्छी का पीछा करते, वे श्रावक कहलाते | जब तक पिच्छी का पीछा हैं , मोक्ष नहीं जा पाते || जिनने पिच्छी पकड़ी, उनको मोक्ष लक्ष्मी वरती | ऐसे त्यागी संतो का , पिच्छी खुद पीछा करती ||"

प्रसाद सागर जी महाराज द्वारा सन्देश


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